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गणेश विसर्जन का महत्व || अष्टावक्र महागीता || ओशो

गणेश  विसर्जन का महत्व    -  ओशो विधि का एक दिन विसर्जन कर देना है। तुमने देखा ,   हिंदू इस संबंध में बड़े कुशल हैं। गणेश जी बना लिए मिट्टी के ,   पूजा इत्यादि कर ली—जा कर समुद्र में समा आए। दुनिया का कोई धर्म इतना हिम्मतवर नहीं है। अगर मंदिर में मुर्ति रख ली तो फिर सिराने की बात ही नहीं उठती। फिर वे कहते हैं अब इसकी पूजा जारी रहेगी। हिंदुओं को हिम्मत देखते हो! पहले बना लेते हैं ,   मिट्टी के गणेश जी बना लिए। मिट्टी के बना कर उन्होंने भगवान का आरोपण कर लिया। नाच—कूद ,   गीत ,   प्रार्थना—पूजा सब हौ गई। फिर अब वह कहते हैं ,   अब चलो महाराज ,   अब हमें दूसरे काम भी करने हैं! अब आप समुद्र में विश्राम करो ,   फिर अगले साल उठा लेंगे। यह हिम्मत देखते हो ?   इसका अर्थ क्या होता है ?   इसका बड़ा सांकेतिक अर्थ है. अनुष्ठान का उपयोग कर लो और समुद्र में सिरा दो। विधि का उपयोग कर लो ,   फिर विधि से बंधे मत रह जाओ। जहां हर चीज आती है ,   जाती है ,   वहा भगवान को भी बना लो ,   मिटा दो। जो भगवान ...

होली ऐसे मत खेलो - ओशो

होली ऐसे मत खेलो - ओशो  तुम देखते हो न, होली की भी लोगों ने कैसी दुर्गति कर दी है! गुलाल वगैरह कम उड़ती है आजकल, धूल ज्यादा उड़ती है। रंग-वंग तो कोई फेंकता ही नहीं, कोलतार! गोबर घोलकर एक-दूसरे को पोत रहे हैं। लोगों की बुद्धि तो देखो! वसंत का उत्सव गोबर घोलकर मनाया जा रहा है। नाली की कीचड़ निकाल लाते हैं लोग। मैं रायपुर में कुछ दिनों तक था। होली करीब आने वाली थी। सामने के सज्जन को मैंने देखा कि वे अपनी नाली में कुछ ईंटें लगा रहे हैं। मैंने कहा: क्या कर रहे हो? उन्होंने कहा कि रोक रहे हैं, होली आ रही है, तो इकट्ठा कर रहे हैं। इसी में पटकेंगे लोगों को। एक तो रायपुर जैसी गंदगी किसी और नगर में खोजना मुश्किल। रायपुर तो हद है। लोग बड़े अभेदभाव को मानते हैं। भेदभाव नहीं करते। कहीं भी पाखाना करेंगे, कहीं भी पेशाब करेंगे..कोई भेदभाव करता ही नहीं। कहां संडास है, कहां सड़क है, इसमें कोई भेदभाव नहीं। अद्वैतवाद। वेदांती हैं लोग। मुझे अपने घर से कालेज तक जाना पड़ता था, कोई डेढ़ मील का फासला था, मैं देख कर दंग रह जाता था, लोग कहीं भी बैठे हैं! महा गंदा नगर है रायपुर। और वहां की नाली को रोक रहे ह...

12 Rare Photos Of Osho and Maa Aanand Sheela

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ध्यान और गर्भकाल - ओशो

ध्यान और गर्भकाल - ओशो  भगवान श्री, गर्भ से पहले और गर्भकाल में यदि माता-पिता ध्यान करते हैं, तो बच्चे पर इसका क्या असर पड़ता है?  निश्चित ही, बच्चे का जीवन जन्म के बाद शुरू नहीं होता। वह तो गर्भाधारण के समय ही शुरू हो जाता है। उसका शरीर ही नहीं बनता मां के पेट, उसका मन भी बनता है, उसका हृदय भी बनता है। मां अगर दुखी है, परेशान है, चिंतित है, तो ये घाव बच्चे पर छूट जाएंगे और ये घाव बहुत गहरे होंगे, जिनको वह जीवन भर धोकर भी न धो न सकेगा। मां अगर क्रोधित है, झगड़ता है, हर छोटी-मोटी बात का बतंगड़ बना बैठती है, इस सबके परिणाम बच्चे पर होने वाले हैं। पति का तो बहुत कम असर बच्चे पर होता है, न के बराबर। निन्यानबे प्रतिशत तो मां ही निर्माण करती है बच्चे का, इसलिए जिम्मेवारी उसकी ज्यादा है। पिता तो एक सामाजिक संस्था है। एक जमाना था, पति नहीं था, और एक जमाना फिर होगा, पिता नहीं होगा। लेकिन मां पहले भी थी, और मां बाद में भी होगी।  मां प्राकृतिक है, पिता सामाजिक है।  पिता एक संस्था है। उसका काम बहुत ही साधारण है जो कि एक इंजेक्शन से भी किया जा सकता है। और इंजेक्शन से ही किय...

मृत्यु का बोध और जीवन दर्शन - ओशो

मृत्यु का बोध और जीवन दर्शन  एक आदमी पागल हो गया था। पागलपन भी उसका बड़ा अजीब था। बहुत बीमार था और चिकित्सकों ने कह दिया कि अब बचने की उम्मीद नहीं। परिवार के लोग इकट्ठे हो गए , मित्र ,  प्रियजन ,  पड़ोसी आ गए। इधर घड़ी की टक-टक और उधर आदमी का डूबता जाना। चिकित्सकों ने तो समय भी बता दिया था कि ठीक छह बजे आदमी मर जाएगा। उसको भी पता था। वह भी घड़ी पर आंखें लगाए था। ठीक छह बजे उसने आंखें बंद कर लीं। मरा तो नहीं। मगर जीवन-दर्शन ,  एक पक्की धारणा। थोड़ा शक-शुबहा भी हुआ ,  हिल-डुल कर भी देखा , थोड़ी-बहुत आंख भी खोल कर देखी होगी कि घड़ी भी दिखाई पड़ती है ,  लोग भी दिखाई पड़ते हैं। लेकिन पत्नियों को तो आप जानते ही हैं। पत्नी पास में ही बैठी थी ,  उसने कहा ,  आंख बंद करो! अरे मर कर और आंख खोलते हो ,  शर्म नहीं आती ?  और जब चिकित्सक ने कहा है ,  और सबसे बड़े चिकित्सक ने कहा है ,  और हजार रुपया फीस भरी है ,  तो कोई झूठ थोड़े ही कहेगा। तुम मर चुके। और ऐसा कोई पति है जो पत्नी की न माने ?  मान लिया बेचारे ने। मर गया बेचारा। मगर...

नारी से भय और शंकराचार्य - ओशो

 नारी से भय और शंकराचार्य  :-  अन्यथा क्यों कोई नारी से डरेगा ?   नारी में क्या डराने वाला है ?   लेकिन शंकराचार्य डर रहे हैं नारी से। यह शंकराचार्य के संबंध में सूचना है , नारी के संबंध में नहीं। मेरे संन्यासी को तो कोई नारी डराए! मेरा संन्यासी कभी यह न कहेगा कि मैं नारी से डरता हूं। और नारी से डरता हो तो मेरा संन्यासी नहीं। क्या डराएगी नारी ?  न मेरी नारियां , संन्यासिनियां डरती हैं पुरुषों से। क्या डरना है इनसे! अरे आदमी जैसे आदमी हैं ,  कोई जंगली जानवर हैं ?  क्या करेंगे ?  आदमी जैसे आदमी हैं , स्त्रियां जैसी स्त्रियां हैं। आदमी और स्त्रियां कोई अलग-अलग नहीं ,  एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। क्या डरना ?  किससे डरना ?  क्यों डरना ? मगर भय पैदा होता है दमन से। और एक दफा दमन का रोग भीतर लग जाए तो जितना भय पैदा होता है ,  फिर दुष्टचक्र पैदा हो जाता है--भय पैदा होता है तो और दबाते हैं ;  और दबाते हैं तो और भय पैदा होता है ;  और भय पैदा होता है तो और दबाते हैं। बस अब कोल्हू के बैल बने ,  अब इसक...

मुक्ति का सूत्र - ओशो

एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--10) देखा तो हर मुकाम तेरी  रहगुजर  में है—(प्रवचन—दसवां) पहला प्रश्न: भगवान ,  एक ही आरजू है कि इस खोपड़ी  से कैसे मुक्ति हो जाए ?  आपकी शरण आया हूं। एक युवक भिक्षु  नागार्जुन  के पास आया और उसने कहा कि मुझे मुक्त होना है। और उसने कहा कि जीवन लगा देने की मेरी तैयारी है। मैं मरने को तैयार हूं ,  लेकिन मुक्ति मुझे चाहिए। कोई भी कीमत हो ,  चुकाने  को राजी हूं। अपनी तरफ से तो वह बड़ी समझदारी की बातें कह रहा था। चिन्मय ने भी यही पूछा है आगे प्रश्न में: सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है उसने भी यही कहा होगा  नागार्जुन  को कि मरने की तैयारी है ;  अब तुम्हारे हाथ में सब बात है। मुझसे न कह  सकोगे  कि मैंने कुछ कमी की प्रयास में। मैं सब करने को तैयार हूं। अपनी तरफ से वह ईमानदार था। उसकी ईमानदारी पर शक भी क्या करें! मरने को तैयार था--और क्या आदमी से मांग सकते हो ?  लेकिन ईमानदारी कितनी ही हो ,  भ्...