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मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा का रहस्य: ओशो

मूर्ति की प्राण—प्रतिष्ठा का रहस्य: प्रश्न: ओशो प्राण—प्रतिष्ठा का क्या महत्व है ?   हां ,  बहुत महत्व है। असल में ,  प्राण—प्रतिष्ठा का मतलब ही यह है। उसका मतलब ही यह है कि हम एक नई मूर्ति तो बना रहे हैं , लेकिन पुराने समझौते के अनुसार बना रहे हैं। और पुराना समझौता पूरा हुआ कि नहीं ,  इसके इंगित मिलने चाहिए। हम अपनी तरफ से जो पुरानी व्यवस्था थी ,  वह पूरी दोहराएंगे। हम उस मूर्ति को अब मृत न मानेंगे ,  अब से हम उसे जीवित मानेंगे। हम अपनी तरफ से पूरी व्यवस्था कर देंगे जो जीवित मूर्ति के लिए की जानी थी। और अब सिंबालिक प्रतीक मिलने चाहिए कि वह प्राण—प्रतिष्ठा स्वीकार हुई कि नहीं। वह दूसरा हिस्सा है ,  जो कि हमारे खयाल में नहीं रह गया। अगर वह न मिले ,  तो प्राण—प्रतिष्ठा हमने तो की ,  लेकिन हुई नहीं। उसके सबूत मिलने चाहिए। तो उसके सबूत के लिए चिह्न खोजे गए थे कि वे सबूत मिल जाएं तो ही समझा जाए कि वह मूर्ति सक्रिय हो गई।  मूर्ति एक रिसीविंग प्‍वाइंट: ऐसा ही समझ लें कि आप घर में एक नया रेडियो इंस्टाल करते हैं। तो पह...

भारत के धर्माकाश में वे कौन चार लोग हैं जो ओशो की दृष्टि में सबसे चमकते हुए सितारे हैं?

🔥🔥 🔥🔥 महाकवि सुमित्रानंदन पंत ने मुझसे एक बार पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं—मेरी दृष्टि में—जो सबसे चमकते हुए सितारे हैं? मैंने उन्हें यह सूची दी : कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति। सुमित्रानंदन पंत ने आंखें बंद कर लीं, सोच में पड़ गये...। सूची बनानी आसान भी नहीं है, क्योंकि भारत का आकाश बड़े नक्षत्रों से भरा है! किसे छोड़ो, किसे गिनो?.. वे प्यारे व्यक्ति थे—अति कोमल, अति माधुर्यपूर्ण, स्त्रैण...। वृद्धावस्था तक भी उनके चेहरे पर वैसी ही ताजगी बनी रही जैसी बनी रहनी चाहिए। वे सुंदर से सुंदरतर होते गये थे...। मैं उनके चेहरे पर आते—जाते भाव पढ़ने लगा। उन्हें अड़चन भी हुई थी। कुछ नाम, जो स्वभावत: होने चाहिए थे, नहीं थे। राम का नाम नहीं था! उन्होंने आंख खोली और मुझसे कहा : राम का नाम छोड़ दिया है आपने! मैंने कहा : मुझे बारह की ही सुविधा हो चुनने की, तो बहुत नाम छोड़ने पड़े। फिर मैंने बारह नाम ऐसे चुने हैं जिनकी कुछ मौलिक देन है। राम की कोई मौलिक देन नहीं है, कृष्ण की मौलिक देन है। इसलिये हिंदुओं ने भी उन्हें प...

गौतम बुद्ध की देशना - ओशो || Osho Talks on Buddha

गौतम बुद्ध से किसी ने पूछा एक सुबह, एक भिक्षु ने, एक खोजी ने, एक सत्यार्थी ने मैं क्या करूं? और बुद्ध ने जो उत्तर दिया, बहुत आकस्मिक था, अनपेक्षित था। बुद्ध ने कहा "चरैवेति, चरैवेति"! चलते रहो, चलते रहो! रुको मत, पीछे लौट कर देखो मत। आगे की चिंता न लो। प्रतिपल बढ़े चलो। क्योंकि गति जीवन है। गत्यात्मकता जीवन है। और जैसे दौड़ती हुई पर्वतों से नदी की धार एक न एक दिन चलते-चलते सागर पहुंच जाती है, ऐसे ही तुम भी चलते रहे तो परमात्मा तक निश्चित पहुंच जाओगे। न तो नदी के पास नक्शा होता, न मार्गदर्शक होते, न पंडित-पुरोहित होते, न पूजा-पाठ, न यज्ञ-हवन, फिर भी पहुंच जाती है सागर। कितना ही भटके, कितने ही चक्कर खाए पर्वतों में, लेकिन पहुंच जाती है सागर। कौन पहुंचा देता है उसे सागर? उसकी अदम्य गति! चरैवेति, चरैवेति। फिक्र नहीं लेती, सोच-विचार नहीं करती कितना भटकाव हो गया, कितना समय बीत गया, कितना और समय लगेगा, ऐसा अधैर्य नहीं पालती। मदमाती, मस्त, प्रतिपल आनंदमग्न। इससे बोझिल भी नहीं होती कि सागर अभी तक क्यों नहीं मिला? इसका संताप भी उसकी छाती पर भारी नहीं हो पाता। मिलेगा ही, ऐसी को...

होश की साधना - ओशो || मुल्ला नसीरुद्दीन पर ओशो || Osho Jokes in Hindi

होश की साधना - ओशो   एक सुंदर अध्यापिका की आवारगी की चर्चा जब स्कूल में बहुत होने लगी तो स्कूल की मैनेजिंग कमेटी ने दो सदस्यों को जांच-पड़ताल का काम सौंपा। ये दोनों सदस्य उस अध्यापिका के घर पहुंचे। सर्दी अधिक थी, इसलिए एक सदस्य बाहर लान में ही धूप सेंकने के लिए खड़ा हो गया और दूसरे सदस्य से उसने कहा कि वह खुद ही अंदर जाकर पूछताछ कर ले। एक घंटे के बाद वह सज्जन बाहर आए और उन्होंने पहले सदस्य को बताया कि अध्यापिका पर लगाए गए सारे आरोप बिल्कुल निराधार हैं। वह तो बहुत ही शरीफ और सच्चरित्र महिला है। इस पर पहला सदस्य बोला, "ठीक है, तो फिर हमें चलना चाहिए। मगर यह क्या? तुमने केवल अंडरवीयर ही क्यों पहन रखी है? जाओ, अंदर जाकर फुलपेंट तो पहन लो।" यहां होश किसको? मुल्ला नसरुद्दीन एक रात लौटा। जब उसने अपना चूड़ीदार पाजामा निकाला तो पत्नी बड़ी हैरान हुई; अंडरवीयर नदारद!! तो उसने पूछा, "नसरुद्दीन अंडरवीयर कहां गया?" नसरुद्दीन ने कहा कि अरे! जरूर किसी ने चुरा लिया!! अब एक तो चूड़ीदार पाजामा! उसमें से अंडरवीयर चोरी चला जाए और पता भी नहीं चला!! चूड़ीदार पाजामा नेतागण पहनते ...

ओशो – चक्र और नींद

ओशो – चक्र और नींद **************************************** जो व्यक्ति मूलाधार चक्र पर केंद्रित है उसकी नींद गहरी न होगी। उसकी नींद उथली होगी क्योंकि यह दैहिक तल पर जीता है। भौतिक स्तर पर जीता है। मैं इन चक्रों कि व्याख्या इस प्रकार भी कर सकता हूं। प्रथम, भौतिक—मूलाधार। दूसरा, प्राणाधार—स्वाधिष्ठान। तीसरा, काम या विद्युत केंद्र—मणिपूर। चौथा, नैतिक अथवा सौंदयपरक—अनाहत। पांचवां, धार्मिक—विशुद्ध। छठा, आध्यात्मिक—आज्ञा। सातवां, दिव्य—सहस्त्रार। जैसे-जैसे ऊपर जाओगे तुम्हारी नींद गहरी हो जाएगी। और इसका गुणवता बदल जायेगी। जो व्यक्ति भोजन ग्रसित है और केवल खाने के लिए जीता है। उसकी नींद बेचैन रहेगी। उसकी नींद शांत न होगी। उसमें संगीत न होगा। उसकी नींद एक दु:ख स्वप्न होगी। जिस व्यक्ति का रस भोजन में कम होगा और जो वस्तुओं की बजाएं व्यक्तियों में अधिक उत्सुक होगा, लोगों के साथ जुड़ना चाहता है। उसकी नींद गहरी होगी। लेकिन बहुत गहरी नहीं। निम्नतर क्षेत्र में कामुक व्यक्ति की नींद सर्वाधिक गहरी होगी। यही कारण है कि सेक्स का लगभग ट्रैक्युलाइजर, नशे की तरह उपयोग किया जाता है। यद...

रज्जु-सर्प भ्रम - ओशो || बचपन की शरारतें भाग - 2 || Osho Funny Talks

सांच-सांच सो सांच-(प्रशनोंत्तर)-प्रवचन-10 सांच-सांच सो सांच-(प्रशनोंत्तर)-ओशो समाधि की सुवास —प्रवचन-दसवां   दिनांक  30  जनवरी ,  सन् 1981 ओशो आश्रम पूना। रज्जु-सर्प भ्रम! साहबदास जी निरंतर इसका उल्लेख करते थे कि अरे ,  यह संसार क्या है ,  बस रस्सी में सांप। उनकी सुनते-सुनते एक दिन मुझे खयाल आया कि जांच तो कर ली जाए। वे रोज रात नौ ,  साढ़े नौ बजे प्रवचन देकर मेरे मकान की बगल की गली से गुजरते थे। वहीं आगे चल कर उनका आश्रम था। गली में अंधेरा रहता था। उन दिनों वहां कोई बिजली भी न थी। सो मैंने एक रस्सी बनाई। बाजार से एक सांप खरीद कर लाया कागज का। कागज के सांप के मुंह को रस्सी में जोड़ा। रस्सी में पतला धागा बांधा और एक खाट खड़ी करके उसके पीछे छिप कर मैं बैठा रहा। जब साहबदास जी वहां से निकले तो मैंने धीरे से धागा खींचा। धागा तो दिख ही नहीं सकता था। अंधेरी रात ,  अंधेरा में धागा ,  काला धागा। रस्सी सरकी ,  सांप का मुंह हिला। साहबदास जी क्या भागे! गिर पड़े ,  पैर फिसल गया। मैं भी घबड़ाहट के मारे भागा , क्योंकि अब ...

बुल्ला की जाना मैं कौण - ओशो

आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-प्रवचन-04 आपुई गई हिराय-(प्रश्नत्तोर)-ओशो दिनांक 0 4 -फरवरी ,  सन् 1981 , ओशो आश्रम ,  पूना। प्रवचन-तीसरा -( फिकर गया सईयो मेरियो नी ) बुल्लेशाह का यह वक्तव्य सुनो। बुल्ला की जाना मैं कौण! न मैं मोमिन विच मसीतां ,  न मैं विच कुफर दीयां रीतां। न मैं पाकां विच पलीतां ,  न मैं मूसा न फरऔन।। बुल्ला की जाना मैं कौण! न मैं अंदर बेद कताबां ,  न विच भंग न शराबां। न विच रहिंदा मस्त खवाबां ,  न विच जागन न विच सौन।। बुल्ला की जाना मैं कौण! न विच शादी न गमनाकी ,  न मैं विच पलीती पाकी। न मैं आबी न मैं खाकी ,  न मैं आतश न मैं पौन।। बुल्ला की जाना मैं कौण! न मैं अरबी न लाहोरी ,  न हिंदी न शहर नगौरी। न मैं हिंदू तुर्क पशौरी ,  न मैं रहिंदा विच नदौन।। बुल्ला की जाना मैं कौण! अव्वल आखर आप नू जाना ,  न कोई दूजा होर पछाना। मैथों होर न कोई सयाना ,  बुल्ला शाह किहड़ा है कौन।। बुल्ला की जाना मैं कौण! अर्थात ,  बुल्लेशाह कहते हैं कि मैं क्या जानूं कि मैं क...