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शिवलिंग का रहस्य - ओशो

शिवलिंग का रहस्य - ओशो



पुराण में कथा यह है कि विष्णु और ब्रह्मा में किसी बात पर विवाद हो गया। विवाद इतना बढ़ गया कि कोई हल का रास्ता न दिखायी पड़ा, तो उन्होंने कहा कि हम चलें और शिवजी से पूछ लें, उनको निर्णायक बना दें। वे जो कहेंगे हम मान लेंगे।

तो दोनों गए। इतने गुस्से में थे, विवाद इतना तेज था कि द्वार पर दस्तक भी न दी, सीधे अंदर चले गए। शिव पार्वती को प्रेम कर रहे हैं। वे अपने प्रेम में इतने मस्त हैं कि कौन आया कौन गया, इसकी उन्हें फिक्र ही नहीं है। ब्रह्मा-विष्णु थोड़ी देर खड़े रहे, घड़ी-आधा-घड़ी, घड़ी पर घड़ी बीतने लगी और उनके प्रेम में लवलीनता जारी है। वे एक-दूसरे में डूबे हैं। भूल ही गए अपना विवाद ब्रह्मा और विष्णु और दोनों ने यह शिवजी के ऊपर दोषारोपण किया कि हम खड़े हैं, हमारा अपमान हो रहा है और शिव ने हमारी तरफ चेहरा भी करके नहीं देखा। तो हम यह अभिशाप देते हैं कि तुम सदा ही जननेंद्रियों के प्रतीक-रूप में ही जाने जाओगे।

इसलिए शिवलिंग बना। तुम्हारी प्रतिमा कोई नहीं बनाएगा। तुम जननेंद्रिय के ही रूप में ही बनाए जाओगे। वही तुम्हारा प्रतीक होगा। यही हमारा अभिशाप है, ताकि यह बात सदा याद रहे कि हम आए थे, लेकिन तुम अपने प्रेम में इतने लीन थे कि तुमने हमारी उपेक्षा की।

इन पुराणों का क्या करोगे? और ये कोई इक्की-दुक्की कथाएं नहीं हैं, ये सारे पुराणों में फैली हैं। - ओशो

Comments

  1. इस असत्य कथा और मिथ्या वचन पर मुझे कुछ नहीं कहना।

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  2. कुछ भी मूर्खता ओशो के नाम से । ओशो ने शिवलिंग को ज्योति रूप कहा था । पहले अच्छे से ओशो को पढ़ समझ लो फिर ब्लॉक बनाओ

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    1. Actually these are his actual words, he has always contradict himself.

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