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Jyoti Se Jyoti Jale (ज्योति से ज्योति जले) - ओशो

Jyoti Se Jyoti Jale 

(ज्योति से ज्योति जले)

21 Chapters   
500 pages 
5.0mb  

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Jyoti se Jyoti Jale (ज्योति से ज्योति जले)

Osho's second book on Sunderdas, a major 17th c Hindi author and disciple of Dadu Dayal, a sort of companion volume to Hari Bolo Hari Bol (हरि बोलौ हरि बोल), which discourses Osho had given a month earlier. 


time period of Osho's original talks/writings
from Jul 11, 1978 to Jul 31, 1978 
number of discourses/chapters
 21

ये प्रवचन माला सुंदर दास के अमुल्य वचनों पर भगवान श्री ने 11-7-1976 से 31-7-1976 तक ओशो आश्रम पूना में बोली गई थी) 
सुंदरदास उन थोड़े—से कलाकारों में एक हैं जिन्होंने इस ब्रह्म को जाना। फिर ब्रह्म को जान लेना एक बात है, ब्रह्म को जनाना और बात है। सभी जाननेवाले जना नहीं पाते। करोड़ों में कोई एक—आध जानता है और सैकड़ों जाननेवालों में कोई एक जना पाता है। सुंदरदास उन थोड़े—से ज्ञानियों में एक हैं, जिन्होंने निःशब्द को शब्द में उतारा; जिन्होंने अपरिभाष्य की परिभाषा की; जिन्होंने अगोचर को गोचर बनाया, अरूप को रूप दिया। सुंदरदास थोड़े—से सद्गुरुओं में एक हैं। उनके एक—एक शब्द को साधारण शब्द मत समझना। उनके एक—एक शब्द में अंगारे छिपे हैं। और ज़रा—सी चिंगारी तुम्हारे जीवन में पड़ जाए तो तुम भी भभक उठ सकते हो परमात्मा से। तो तुम्हारे भीतर भी विराट का आविर्भाव हो सकता है। पड़ा तो है ही विराट, कोई जगानेवाली चिंगारी चाहिए।
चकमक पत्थरों में आग दबी होती है, फिर दो पत्थरों को टकरा देते हैं, आग प्रकट हो जाती है। ऐसी ही टकराहट गुरु और शिष्य के बीच होती है। उसी टकराहट में से ज्योति का जन्म होता है। और जिसकी ज्योति जली है वही उसको ज्योति दे सकता है, जिसकी ज्योति अभी जली नहीं है। जले दीए के पास हम बुझे दीए को लाते हैं। बुझे दीए की सामर्थ्य भी दीया बनने की है, लेकिन लपट चाहिए। जले दीए से लपट मिल जाती है। जले दिए का कुछ भी खोता नहीं है; बुझे दीए को सब मिल जाता है, सर्वस्व मिल जाता है।
यही राज है गुरु और शिष्य के बीच। गुरु का कुछ खोता नहीं है और शिष्य को सर्वस्व मिल जाता है। गुरु के राज्य में ज़रा भी कमी नहीं होती। सच पूछो तो, राज्य और बढ़ जाता है। रोशनी और बढ़ जाती है। जितने शिष्यों के दीए जगमगाने लगते हैं उतनी गुरु की रोशनी बढ़ने लगती है।
यहां जीवन के साधारण अर्थशास्त्र के नियम काम नहीं करते। साधारण अर्थशास्त्र कहता हैः जो तुम्हारे पास है, अगर दोगे तो कम हो जाएगा। रोकना, बचाना। साधारण अर्थशास्त्र कंजूसी सिखाता है, कृपणता सिखाता है। अध्यात्म के जगत् में जिसने बचाया उसका नष्ट हुआ; जिसने लुटाया उसका बढ़ा। वहां दान बढ़ाने का उपाय है। वहां देना और बांटना—विस्तार है। वहां रोकना, संगृहीत कर लेना, कृपण हो जाना—मृत्यु है।
-ओशो

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